ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ झारखण्ड की लड़ाई –

झारखण्ड की लड़ाई एवं विद्रोह

१. कोल विद्रोह 

२. संथाल विद्रोह 

३. टाना भगत आंदोलन 

कोल विद्रोह 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में झारखण्ड के निवासियों का अप्रतिम योगदान रहा है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७ के 26 साल पहले ही झारखण्ड की जनजातियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया था। झारखण्ड की सांस्कृतिक पहचान राजनितिक रूप में १८३१ में कोल विद्रोह के रूप में अवतरित हुई। इसमें मुंडा , हो , उरांव , भुइंयाँ , आदि जनजाति शामिल हुई। विद्रोह के केंद्र बिंदु थे – रांची , पूर्वी सिंघभूम , पश्चिम सिंघभूम , पलामू। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यह पहला विशाल आदिवासी आंदोलन था। भले ही १७८३ में तिलका मांझी का विद्रोह तथा चेरो आंदोलन पुरे झारखण्ड क्षेत्र में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ एक आग की तरह फ़ैल गयी थी। तिलका मांझी ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संग्राम की चेतना फैलाने वाले आदिविद्रोही थे। इन्होने १७७२ में जमींन अथवा फसल पर परंपरागत अधिकार के लिए संघर्ष छेड़ा। इनके अगुवाई में विद्रोह का सन्देश गांव – गांव में सखुवा का पत्ता घुमाकर किया जाता था। इन्होने सुल्तानगंज की पहाड़ियों से छापामार युद्ध का नेतृत्व किया था।  इनके तेज़ तीरों से ब्रिटिश सेना का सेनापति अगस्टीन क्लीवलैंड बुरी तरह घायल हुआ। लेकिन तिलका मांझी को अंततः १७८५ में भागलपुर में फांसी की सजा दी गयी। 

कोल विद्रोह के पहले तमाड़ विद्रोह, विष्णु मानकी के मार्गदर्शन में बुंडू में मुंडा विद्रोह, १७९८ में चुआड़ विद्रोह, १७९८ – १७९९ में मानभूम में भूमिज विद्रोह और १८०० में पलामू में चेरो विद्रोह ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संग्राम की एक अटूट श्रृंखला कायम कर दी। १७६५ तक छोटानागपुर के क्षेत्र में अंग्रेजी राज सम्मिलित हो चूका था, लेकिन इस क्षेत्र पर कई – कई सालों तक अंग्रेजी हुकूमत पूरी तरह से अपना कब्ज़ा बनाने में असफल रही।

1816 – 17 में छोटानागपुर के राजा की दंड शक्ति पूरी तरह से छीन ली गयी। निरंतर जारी विद्रोह के कारण से मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के अधीन यहाँ प्रत्यक्ष शासन की स्थापना हुई। इसी के साथ शुरू हुई ‘ रेगुलेशन ‘ की परिपाटी। छोटानागपुर के क्षेत्र में कोल विद्रोह के नायक थे – सिंदराय और बिंदराय मानकी। यह विद्रोह ११ दिसंबर १८३१ को फुट पड़ा। १८३२ में कप्तान विलिकसन के नेतृत्व में इस विद्रोह को दबा दिया गया। 

कप्तान विलिकसन ने विद्रोहों की वजहों को रेखांकित करते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा – ” पिछले कुछ वर्षों के भीतर पुरे नागपुर भर के कोलों पर वहां के इलाकेदारों, जमींदारों, और ठेकेदारों ने ३५% लगान बढ़ा दिए हैं। परगने भर की सारी सड़कें कोलो को बिना किसी मजदूरी के बेगारी द्वारा बनानी पड़ी। महाजन लोग जो उन्हें रूपये या अनाज उधार दिया करते थे, १२ महीने के भीतर ही उनसे ७०% और कभी-कभी उससे भी ज्यादा वसूल कर लेते थे। उन्हें शराब पर लगाए कर, जो चार आना प्रति घर के हिसाब से निश्चित थी लेकिन वसूली आमतौर पर इससे कहीं ज्यादा की जाती थी। और इसके अलावा सलामी के रूप में प्रति गावों एक रूपया तथा एक बकरी भी ली जाती थी।

ये कोलो को बिलकुल गवारा न थी। उन्हें अफीम की खेती भी नापसंद थी। उसके बाद वहां एक डाक प्रणाली चलायी गयी थी, जिसका पूरा खर्च गाँव के कोलो को वहन करना पड़ता था। कोलो के बिच यह भी शिकायत का विषय था की जो लोग बहार से आकर नागपुर में बसे हैं, उनमें से बहुत ने जिनका कोलों पर बेमतलब का क़र्ज़ लद गया है, अपने क़र्ज़ की वसूली के लिए बहुत सख्ती की है। ज्यादातर कोलो को उनके नाम ‘सेवक – पट्टा ‘ लिख के देना पड़ा है। यानी उनके हाथ अपनी सेवा तब तक के लिए बेच देनी पड़ी, जब तक क़र्ज़ अदा नहीं हो जाये। इसका मतलब है अपने आप को ऐसे एक बंधन में दाल देना कि उनकी पूरी की पूरी कमाई का सारा हकदार महाजन बन जाये और वे जीवन भर के लिए महाजन के नौकर या दास बन जाये। 

बीच – बीच में ऐसे कई दर्दनाक हादसे हुए जिनके मात्रा स्मरण से ही कोलो के मन में नफरत की आग ज्वालामुखी में बदल जाती थी। और इन्ही कारणों के वजह से कोलो का संघर्ष अब राष्ट्रीय संघर्ष का रूप ले चूका था। कॉल विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने बड़े पैमाने पर संघर्ष किया। कलकत्ता , बनारस ,सम्भलपुर,नागपुर सभी दिशाओं में अंग्रेजी पल्टन भेजी गयी।

कप्तान विलिन्कसान छोटानागपुर पठार के उत्तरी छोर, पिठोरिया नमक एक जगह पर १८३२ में जनवरी के मध्य में पहुंचा। लेकिन उसने लड़ाई फरवरी के मध्य में आरम्भ की। ये युद्ध बड़ा ही भीषण था। अंग्रेजी सेना को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। इस पर हंटर ने 40 साल बाद एक पुस्तक लिखी – “स्टैटिस्टिकल एकाउंट्स ऑफ़ बंगाल “

उधर पलामू में खरवार लोगों का विद्रोह चरम पर था। यहाँ तक की अँगरेज़ घुड़सवार पल्टन के एक जत्थे को जो कि पलामू के रस्ते से छोटानागपुर में घुसने की कोशिश कर रहा था। लेकिन वहां के विद्रोहिओं ने उन्हें इकठा कर हमला कर दिया। तब जाकर धीरे धीरे कॉल विद्रोह दबा। फिर बिंदराय मंकी के आत्मसमर्पण ने इस विद्रोह को अंततः दबा दिया। अंग्रेजी सेना ने बिंदराय मंकी को घेर कर हज़ारीबाग़ जेल में डाल  दिया।  

कोल विद्रोह दबा और फिर छोटानागपुर के इलाकों पर अंग्रेज़ों का शासन स्थापित हुआ। विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि – उस क्षेत्र से बंगाल सरकार के प्रख्यात कानून हटा दिए गए। अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अंग्रेज़ों ने एक एजेंसी का निर्माण किया और रांची को उसकी राजधानी बनाया। १८३७ में हो जनजाति को हराकर अंग्रेज़ों ने एक समझौता किया।

संथाल विद्रोह –

कोल विद्रोह के लगभग २२ साल बाद १८५५-५६ में संथाल जनजाति के नेतृत्व में संथाल परगना की पूरी जनजाति उठी और उसने विद्रोह के विरुद्ध आवाज़ उठायी। लार्ड कार्नवालिस द्वारा लादी गयी ‘स्थायी जमींदारी प्रथा ‘ के खिलाफ हुए उस संघर्ष को संथाल विद्रोह कहा जाता है।

उस विद्रोह की लपटें संथाल परगना और भागलपुर से लेकर बंगाल की सीमा और छोटानागपुर के हज़ारीबाग जिले तक फ़ैल गयी। संथाल लोग वर्त्तमान छोटनंगपुर डिवीज़न एवं बांकुड़ा, पुरुलिया  और मेदिनीपुर जिलों की और से आकर १८वीं सदी में बिहार के पूर्वी इलाकों में आकर बस गए थे।

संथाल विद्रोह का मुख्य कारण था – पछाहीं महाजनों और साहूकारों के शोषण और अत्याचार के खिलाफ संथालों का आर्थिक अशंतोष। ये महाजन और साहूकार दामिन-ए -कोह में अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ी संख्या में बस गए थे। उन्होंने संथालों का शोषण कर बहुत थोड़े दिनों में बहुत संपत्ति जमा कर ली थी। वे बरसात के कुछ महीनों में संथालों को कुछ रूपये, कुछ चावल या कुछ अन्य सामान उधार देते थे बड़ी चालाकी से कुछ ही दिनों में जीवन भर के लिए उनके भाग्य विधाता बन जाते थे। क़र्ज़ चुकाने के लिए संथालों को अपनी जमीं से हाथ धोना पड़ता था और कई को क़र्ज़ के बदले गुलामो स्वीकार करनी पड़ती थी – उन्हें अपने आप को साहूकारों का बंधुवा बनना पड़ता था। गुलामी की इस प्रथा को क़ानूनी अदालतों में स्वीकृति दी जाती थी।

संथालों की असंतोष की चिंगारी को विद्रोह की ज्वाला में बदला सिद्धू , कान्हू ,चाँद और भैरव ने। इस विद्रोह में हज़ारों की तादाद से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गयी। संथाल विद्रोह के बाद ही संथाल बहुल इलाके को भागलपुर और वीरभूम से अलग कर किया गया और संथाल परगना नाम से अलग जिला बनाया गया। 

संथाल विद्रोह की आग शांत हुई भी नहीं की भारत की आज़ादी का पहला महासंग्राम १२ जून १८५७ को झारखण्ड क्षेत्र के रोहिणी नामक गाँव से शुरू हुआ।

१८५५-५६ के संथाल विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने झारखण्ड क्षेत्र में आतंक के साथ -साथ प्रलोभन का साम्राज्य विकसित किया। इसकी वजह स १८५७ के महासंग्राम के बाद पुरे झारखण्ड क्षेत्र में विद्रोह के स्वर कई सालों तक मंद रहे। आदिवासियों की संस्कृति उनके स्वशासन की सामाजिक राजनितिक प्रणालियों में रूपबद्ध है।

उन प्रणालियों को तोड़े बिना संस्कृति का वह जीवन रास ख़तम होने वाला नहीं है जो आदिवासियों को समाज के लिए कुर्बान होने, सामूहिकता और संघर्ष के लिए फिर उठ खड़े होने की ताकत देता है।    

टाना भगत आंदोलन

१९१२ में बंगाल से अलग होकर बिहार राज्य की स्थापना हुई। इसके बाद झारखण्ड क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की रफ़्तार फिर तेज़ हो गयी। इसमें टाना भगत आंदोलन की भूमिका बहुत एहम थी। ये आंदोलन १९१३-१४ में शुरू हुआ। ये आंदोलन गुमला जिला के विष्णुपुर थाना चरपी नवा टोली के जतरा उरांव के नेतृत्व में शुरू हुआ। उसके तीन मुद्दे स्पष्ट थे –

१. स्वशासन का अधिकार 

२. साड़ी जमीं ईश्वर की है। इसीलिए उस पर लगान का विरोध 

३. आदर्श समाज की स्थापना के लिए ऊंच -नीच का भेदभाव मिटाना 

ये दौर पुरे राष्ट्र में आजादी के लिए संग्राम का समय था। टाना भगत आंदोलन में शामिल नेता और कार्यकर्ता गांधी के व्यक्तिगत और कृतित्व से प्रभावित हुए। स्थानीय माना जाने वाला आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। रांची में रॉलेक्ट एक्ट और जलियांवाला हत्याकांड के खिलाफ गुलाब तिवारी के नेतृत्व में लगातार आंदोलन चला। इसी बिच कांग्रेस सर्कार ने १९२० में रांची जिला कोग्रेस कमिटी की स्थापना की। १९२२ में कांग्रेस अधिवेशन में टाना भगतों ने बढ़ – चढ़ कर हिस्सा लिया। वे रामगढ़, नागपुर और लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में भी शामिल हुए।

आंदोलन के दौरान टाना भगतों ने रहन-सहन, खान पान और निजी व सामाजिक रीती रिवाज़ में परिवर्तन कर एक नया पंथ ही कायम कर लिया था। उनके लिए शराब और मांस का सेवन वर्जित था। रंगीन कपडे और गहने धारण करना वर्जित था। शरीर को गोदना से सजाना मना था। शिकार खेलना , अखाडा खेलना और जत्रा में भाग लेना माना था।

आज़ादी के संघर्ष के लिए भी सादा जीवन और उच्च विचार की राह की तलाश में टाना भगत जब गाँधी विचारों के संपर्क में आये तो उनको महसूस हुआ की उनके और गाँधी के विचारों में समानता मिली। टाना भगतों ने आज़ादी की लड़ाई में अपना सर्वश्व न्योछावर कर दिया। 

१९२० से ही झारखण्ड क्षेत्र में आज़ादी के आंदोलन में संघर्ष और रचना के नए नए आयाम विकसित हुई। यहाँ तक की कई इलाकों में कांग्रेस के दिशादर्शन में वन सत्याग्रह भी चलाये गए। १९३० में ये सत्याग्रह आंदोलन खरवार आंदोलन के नाम से चर्चित हुई। छोटानागपुर उन्नति समाज ही आगे चलकर आदिवासी महासभा बना और देश आज़ाद होते ही झारखण्ड क्षेत्र में झारखण्ड पार्टी का उदय हुआ , जहाँ से झारखण्ड के इतिहास की नयी यात्रा शुरू हुई।

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